बस्ती में ‘मिट्टी माफिया’ का नंगा नाच: सोनहा में खाकी और राजस्व विभाग की मिलीभगत से लूटी जा रही धरती!
सोनहा में ‘सोना’ बन रही मिट्टी: जिम्मेदारों की चुप्पी, डंपरों की खुली लूट और मौन बैठा प्रशासन! पकरी मोती में 'अवैध खनन' का काला साम्राज्य: किसकी शह पर फल-फूल रहा है मिट्टी माफिया का यह खेल?
अजीत मिश्रा (खोजी)
सोनहा में ‘मिट्टी के लालच’ का नंगा नाच: क्या प्रशासन ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली है?
- बस्ती में विकास का अनोखा मॉडल: दिन में चालान का दिखावा, रात में ‘मिट्टी की चोरी’ का बड़ा बुलावा!
- सोनहा पुलिस और राजस्व विभाग का ‘मौन व्रत’: पकरी मोती की मिट्टी बिक रही, अधिकारी कह रहे ‘सब चंगा है’!
- क्या बिक चुकी है सोनहा की जमीन? खनन विभाग की नाक के नीचे चल रही है संगठित लूट!
- सरकारी खजाना खाली, माफिया की जेब भरी: पकरी मोती में आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है खनन का खेल?
बस्ती: जनपद के सोनहा थाना क्षेत्र के पकरी मोती इलाके में इन दिनों ‘विकास’ के नाम पर ‘विनाश’ की पटकथा लिखी जा रही है। यहाँ की धरती का सीना चीरकर जो मिट्टी निकाली जा रही है, वह मात्र मिट्टी नहीं, बल्कि क्षेत्र के माफियाओं के लिए “सोना” बन गई है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस खुली लूट की इजाजत दी किसने है?
सफेदपोश और खाकी की मिलीभगत का काला खेल
पकरी मोती मार्ग पर दौड़ते डंपरों के पहिए यह गवाही दे रहे हैं कि इस खेल में बड़े खिलाड़ियों का संरक्षण प्राप्त है। स्थानीय लोगों की मानें तो, “बिना चढ़ावा दिए यहाँ एक डंपर का पहिया भी नहीं घूमता।” हर डंपर के पीछे 500 से 1000 रुपये की रोजाना वसूली का जो जाल बुना गया है, वह सीधे तौर पर कानून के शासन को चुनौती दे रहा है। क्या यह संभव है कि जिम्मेदार पुलिस और राजस्व विभाग के नाक के नीचे से दिन-रात मिट्टी के पहाड़ गायब हो जाएं और उन्हें भनक तक न लगे? यह चुप्पी अनभिज्ञता नहीं, बल्कि ‘मौन सहमति’ की ओर इशारा करती है।
खनन विभाग का ‘दोगलापन’ और राजस्व को चूना
बस्ती खनन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं। दिन के उजाले में केवल वैध चालान दिखाकर वाहवाही लूटने वाला प्रशासन, रात के अंधेरे में होने वाली उस संगठित चोरी पर पर्दा क्यों डाले हुए है?
तहसील प्रशासन का रवैया तो और भी संदिग्ध है। जब क्षेत्र की उपजाऊ भूमि से मिट्टी का खनन हो रहा है, तो उस मिट्टी के एवज में सरकारी खजाने में कितना राजस्व जमा हुआ? इस सवाल पर तहसील के गलियारों में सन्नाटा पसर जाता है। नायब तहसीलदार से लेकर स्थानीय चौकी तक, उंगलियां उठना लाजिमी है क्योंकि इतनी बड़ी लूट बिना प्रशासनिक मिलीभगत के संभव ही नहीं है।
प्रशासन की जवाबदेही का सवाल
पकरी मोती की यह मिट्टी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि क्षेत्र की धरोहर है। लेकिन ‘मिट्टी माफिया’ के साम्राज्य ने इसे कमाई का जरिया बना लिया है।
- क्या जिले के आला अधिकारी इस ‘मिट्टी के खेल’ की निष्पक्ष जांच कराएंगे?
- क्या अवैध खनन में लिप्त डंपरों को सीज कर उनकी संपत्ति कुर्क की जाएगी?
- क्या वसूली करने वाले उन ‘नेताओं और अफसरों’ के नाम सामने आएंगे जिनकी बदौलत यह काला कारोबार फल-फूल रहा है?
सोनहा का यह इलाका आज प्रशासनिक शिथिलता का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है। अगर समय रहते इस संगठित लूट पर अंकुश नहीं लगा, तो वह दिन दूर नहीं जब पकरी मोती का भूगोल ही बदल जाएगा और जिम्मेदार अधिकारी केवल कागजों में ‘सब ठीक है’ की रिपोर्ट दर्ज करते रह जाएंगे।
जनता की नजरें अब डीएम साहब के सख्त कदम का इंतजार कर रही हैं। क्या प्रशासन नींद से जागेगा, या फिर यह ‘मिट्टी का काला कारोबार’ यूं ही चलता रहेगा?












